अष्टविनायक, देहु, आळंदी, जेजुरी की यात्रा- 3 दिन, प्रति व्यक्ति चार्ज 2000 रु. (खाना, रहना, चाय, नाश्ता शामिल)

लंबे समय से महाराष्ट्र के अष्टविनायक के दर्शन का इंतजार था। इंतजार इसलिए क्योंकि मैं पहले दो-तीन बार दर्शन के लिए जाने की कोशिश कर चुका था, लेकिन उसमें कामयाब नहीं हो पा रहा था। ये मौका मिला मुझे 12,13 और 14 मई 2017 को। मुंबई से सटे उपनगर नालासोपारा (पश्चिम) स्थित साईं धाम मंदिर ने मुझे इसका मौका दिया। मेरे घर के पास में ही है ये मंदिर। इस मंदिर के जरिये मैं शिर्डी भी हो आया हूं। ये मंदिर नियमित तौर पर शिर्डी, अष्टविनायक (इसी के साथ  आलंदी, देहू और जेजुरी की भी यात्रा) और साथ ही शेगांव की यात्रा का भी आयोजन करता है। 

पिछले साल इस मंदिर की तरफ से आयोजित शिर्डी यात्रा में शामिल हुआ था। केवल 700 रुपए प्रति व्यक्ति का भुगतान कर। यात्रा के दौरान रहना, खाना, चाय, नाश्ता सब इसी 700 रुपए में शामिल था। हालांकि इस साल शिर्डी यात्रा के लिए शुल्क बढ़ाकर 800 रुपए प्रति व्यक्ति कर दिया गया है। मंदिर की तरफ से शिर्डी यात्रा का जब भी आयोजन किया जाता है, तो वो दो दिनों  के लिए। शनिवार दोपहर एक बजे मंदिर प्रांगण से यात्रियों से सजी बस प्रस्थान करती है और शाम 7 बजे शिर्डी पहुंच जाती है। अगले दिन यानी रविवार शाम 7-8 बजे वापस मंदिर प्रांगण में बस पहुंच जाती है। शनिवार, रविवार को जिनकी छुट्टी रहती है, उनके लिए शिर्डी यात्रा का ये बढ़िया मौका हो सकता है।

ये तो बात हुई शिर्डी यात्रा की। बात फिर से अष्टविनायक यात्रा की करते हैं। शुक्रवार को ये यात्रा शुरू हुई। मंदिर प्रांगण में जाकर सभी यात्रियों को बस में बैठना था। पूरी तैयारी के साथ शुक्रवार सुबह साढ़े पांच बजे मेरे अलावा आसपास के 32 और लोग, जिसमें बस का स्टाफ भी शामिल था, सवार हुए। इसमें मेरे और बस स्टाफ को छोड़ सभी लोग परिवार के साथ थे। 

मालशेज की खूबसूरत वादियों से होते हुए हम लोग सबसे पहले लेण्याद्रि पहुंचे। रास्ते में खाना, नाश्ता, चाय सबकुछ हो रहा था। लेण्याद्रि गणपति की कुछ खास बातें बता दूं। ये गणपति गुफा में विराजमान हैं। यहां पर कई गुफाएं हैं। एक गुफा में गणपति विराजमान हैं। एक गुफा में स्तूप भी मौजूद है।

करीब 300 सीढ़ियां चढ़कर बप्पा का दर्शन किया जाता है। आप ऊपर जाने-आने के लिए पालकी की भी मदद ले सकते हैं। इसके लिए प्रति व्यक्ति आपको 700 रुपए चुकाना होगा। (जब मैं गया था, तब का रेट है)। लेण्याद्रि गणपति के दर्शन के लिए आपको टिकट लेना पड़ेगा। प्रति व्यक्ति टिकट के लिए आपको 15 रुपए देने होंगे। अगर आपके साथ 15 साल से कम उम्र का कोई है, उसके लिए टिकट नहीं लेना पड़ेगा।

> लेण्याद्रि-: गिरिजात्मक, ओझर- विघ्नेश्वर, रांजनगाव-महगणपति की तस्वीरें:
12-05-2017:  सुबह साढ़े 5 बजे बस से साई धाम मंदिर, नालासोपारा पश्चिम से यात्रा के लिए निकले, मालशेज घाट होते हुए सबसे पहले उसी दिन लेण्याद्रि गणपति के दर्शन किये। उस दिन लेण्याद्रि गणपति के अलावा ओझर- विघ्नेश्वर, रांजनगाव-महगणपति के भी दर्शन किए और शाम करीब 9 बजे आळंदी (यहीं पर दो रात धर्मशाला में ठहरे)।




























>थेऊर-चिंतामणि,सिद्धटेक-सिद्धिविनायक,मोरेगाव-मोरेश्वर, जेजुरी (खंडोबा के मंदिर) की तस्वीरें:
13-05-2017: सुबह 6 बजे आळंदी (यहीं पर दो रात धर्मशाला में ठहरे) से बस निकलकर सबसे पहले थेऊर-चिंतामणि फिर उसी दिन सिद्धटेक-सिद्धिविनायक और उसके बाद मोरेगाव-मोरेश्वर और सबसे आखिरी में जेजुरी (खंडोबा के मंदिर) के दर्शन किए। 




























>आळंदी (संत ज्ञानेश्वर का समाधिस्थल) , देहु (संत तुकाराम का गाथा मंदिर और मुख्य मंदिर), पाली-बल्लालेश्वर, महड-वरद विनायक:
14-05-2017: सबसे पहले सुबह 6 बजे आळंदी (संत ज्ञानेश्वर का समाधिस्थल) के दर्शन किये, फिर आळंदी (यहीं पर दो रात धर्मशाला में ठहरे) से करीब सुबह 8 बजे घर्मशाला छोड़ दिए। उस दिन सबसे पहले देहु (संत तुकाराम का गाथा मंदिर और मुख्य मंदिर) के दर्शन किये। फिर उसी दिन पाली-बल्लालेश्वर और सबसे आखिरी में महड-वरद विनायक के दर्शन किए। यहां से शाम करीब साढ़े चार बजे वापस नालासोपारा के लिए प्रस्थान। खंडाला होते हुए उसी दिन शाम के करीब 9 बजे हम लोग साइ मंदिर पहुंच गए, जहां से हमने इस यात्रा की शुरुआत थी। 












संत तुकाराम गाथा मंदिर, देहू



संत तुकाराम गाथा मंदिर, देहू

संत तुकाराम गाथा मंदिर, देहू की दीवारों पर अभंग





संत तुकाराम मुख्य मंदिर, देहू


संत तुकाराम मुख्य मंदिर, देहू








यानी कुल मिलाकर हमने करीब 65 घंटे में 2000 किलोमीटर का सफर तय किया। इसके 2000 रुपए चुकाने पड़े। इतने पैसों में खाना, नास्ता, चाय,  रहना सब शामिल था। स्टाफ समेत 33 लोगों के साथ यात्रा मजेदार रही। देहू में संत तुकाराम का गाथा मंदिर कितनी खूबसूरत है कि जब आप देखेंगे तो देखते रह जाएंगे। वहां पहुंचते ही आपके मुंह से बरबस निकलेगा, वाह..कितना खूबसूरत है। इस मंदिर की दीवारों पर संत तुकाराम की रचनाएं, जिसे अभंग के नाम से जाना जाता है, उकेरी हुई हैं। हम लोग गए तो थे मालशेज घाट की खूबसूरत वादियों से होते हुए, लेकिन वापस लौटे खंडाला होते हुए। 









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