मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के बारे में जानें

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद से रघुरान राजन के जाने के बाद नीतिगत दर और ब्याज दर के बारे में नई व्यवस्था की शुरुआत हुई। आइए, जानते हैं क्या है वो व्यवस्था और इस काम में पहले से चली आ रही व्यवस्था से कैसे अलग है... 

>मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी):  Monetary Policy Committee (MPC):

-मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) नई मौद्रिक नीति का ऐलान करेगी
-मौद्रिक नीति के ऐलान की सारी शक्ति पहले आरबीआई के गवर्नर के
पास रहती थी,लेकिन अब मौद्रिक समीक्षा समिति बहुमत के आधार पर
मौद्रिक नीति का निर्णय लेगी
-रिजर्व बैंक का मुखिया इससे पहले वजूद में रही उस पांच सदस्यीय
तकनीकी परामर्श समिति की सिफारिशों की उपेक्षा कर सकता था
जो उसे मौद्रिक नीति के  ऐलान से पहले ब्याज दरों पर
 'इनपुट' देती थी.
-27 जून 2016 से समिति प्रभावी
-छह सदस्यों की इस समिति में तीन प्रतिनिधि सरकार के और
तीन रिजर्व बैंक के रहेंगे.
-समिति का चेयरमैन भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक के तीन
प्रतिनिधियों में रिजर्व बैंक का गवर्नर भी शामिल रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक के बाकी
दो प्रतिनिधि के तौर पर एक डिप्टी गवर्नर और आरबीआई का एक अधिकारी रहेगा
-केंद्र सरकार कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली Search-cum-Selection
Committee की सिफारिश पर अपने तीन प्रतिनिधियों के नाम की घोषणा करेगी।
-सरकार की तरफ से शामिल प्रतिनिधि में इकोनॉमिक्स या बैंकिंग या फाइनेंस या
मौद्रिक नीति के क्षेत्र के जानकार होंगे।
-सरकार के प्रतिनिधियों का कार्यकाल 4 साल का होगा और द्वारा मौद्रिक नीति समिति
में उनकी नियुक्ति नहीं की जाएगा।
-एमपीसी की हर बैठक के बाद उसके फैसले का प्रकाशन किया जाएगा
-एमपीसी सरकार और रिजर्व बैंक के बीच जरूरी पुल की तरह काम करेगी

>क्यों पड़ी मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी):  Monetary Policy 
Committee (MPC) के गठन की जरूर:

- ब्याज दरों को लेकर अक्सर सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बीच
टकराव जैसे हालात रहे
- दोनों के उद्देश्य अलग रहे.
-सरकार का जोर विकास पर रहा और रिजर्व बैंक का महंगाई को कम रखने पर. इसलिए
बैंक हमेशा मौद्रिक नीति अपने हिसाब से बनाता रहा.
-अक्टूबर 2012 में तो तत्कालीन गवर्नर डी सुब्बाराव और यूपीए सरकार में वित्त मंत्री पी चिदंबरम
के बीच टकराव इस हद तक बढ़ गया था कि चिंदबरम ने कह दिया कि विकास भी महंगाई जितनी
ही बड़ी चुनौती है और अगर सरकार को इस चुनौती से निपटने के रास्ते पर अकेले चलना है तो
वह अकेले ही चलेगी.
-टकराव की इसी पृष्ठभूमि में एमपीसी का गठन हुआ था

>RBI के गवर्नर का जोर महंगाई पर क्यों ? 
-पूर्व गवर्नर रघुराम राजन हमेशा कहते रहे कि महंगाई
 की सबसे ज्यादा मार गरीबों पर पड़ती है जिन्हें आवास,
खाने, दवाइयों और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए
ज्यादा खर्च करना पड़ता है और इससे उनका विकास ठप
हो जाता है।
-विकास को प्राथमिकता देने वालों की दलील है कि अगर अपेक्षित
विकास नहीं होगा तो वे रोजगार के अवसर भी पैदा नहीं होंगे जिनसे
लोगों की क्रयशक्ति बढ़ती है।

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